अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

Showing posts with label सार छंद-कल की पीड़ित नारी. Show all posts
Showing posts with label सार छंद-कल की पीड़ित नारी. Show all posts

Thursday, 7 August 2014

सार छंद-कल की पीड़ित नारी

छन्न पकैया, छन्न पकैया, कल की पीड़ित नारी। 
कितनी है खुश आज ओढ़कर, दुहरी ज़िम्मेदारी।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, खेत खड़ा है भूखा। 
अन्न देखकर गोदामों में, खुलकर हँसा बिजूखा।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, फसल बाढ़ ने खाई। 
वे फाँसी पर झूल रहे, ये,  सर्वे करें हवाई।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, बात नहीं यह छोटी। 
कल उसको खाते थे हम, अब, हमें खा रही रोटी।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, यह ऋतु बारहमासी। 
पुत्र विदेशी साहब, घर में, पिता हुए बनवासी।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, हतप्रभ है योगासन। 
शीर्षासन में खड़ा आमजन, नेता करें शवासन। 

छन्न पकैया, छन्न पकैया, हर सच्चाई नंगी। 
खिन्न हुआ मन, देख देश की, तस्वीरें दो रंगी।

-कल्पना रामानी 

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

Followers