अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

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Sunday, 22 July 2012

पुत्र बसा परदेस में





पुत्र बसा परदेस में, पद का चढ़ा बुखार।
सपने अपने ले गया, सात समंदर पार।

 माँ के जो अरमान थे, सकल हो गए धूल।
फूल दिये थे पुत्र को, पुत्र दे गया शूल।

 सींचा जिसको रक्त से, सेवा की दिन रात।
उसने मन पर मातु  के, किया कुठाराघात।

दिनकर सुख देता नहीं, नहीं सुहाती रात।
खुद ही अपने मौन से, करती रहती बात।

आज विदेशी चाह में, युवा हुए मदहोश।
दोषी क्या  संतान ही, पालक सब निर्दोष?

खुश होकर संतान को, भेजा खुद से दूर।
देश छोड़ने के लिए, किया उसे मजबूर।

 बचपन में जागे अगर, जन्म भूमि अनुराग।
गाएगी संतान क्यों, फिर विदेश का राग।

 रोती है संतान भी, जो बस गई विदेश।
समाधान मिलकर करें, कहना इतना शेष।

-कल्पना रामानी

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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