अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

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Thursday, 20 December 2012

ईश तुम्हारे द्वार पर



ईश तुम्हारे द्वार पर, ये कैसा अन्याय।
कोई पाए दो गुना, कोई वापस जाय।
 
समदरसी कहकर गए, तुमको संत फ़क़ीर।
पर है सबकी क्यों भला, अलग-अलग तक़दीर।
 
हम तो प्राणी तुच्छ हैं, तुम सबके करतार।
दाता, फिर यह किसलिए, भेद भाव का वार।
 
जाएँ किसकी हम शरण, बतलाओ हे ईश।
धरती पर दिखता नहीं, कोई न्यायाधीश।
 
नाथ तुम्हारे राज्य में, हम क्यों हुए अनाथ।
माना तुमको ही सखा, फिर भी दिया न साथ।
 
प्रभुजी, कर दो अब हमें, बीच भँवर से पार।
या निज हाथों खोल दो, मुक्ति धाम के द्वार। 


-कल्पना रामानी   

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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