अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

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Thursday, 9 January 2014

सार छंद-यह सर्कस का खेला

छन्न पकैया, छन्न पकैया, भरा हुआ है मेला।
कितना है रोमांचक देखो, यह सर्कस का खेला ।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, ये भोले से मुखड़े। 
खुशियाँ बाँट छिपाते अपने, हिय में दारुण दुखड़े।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, आहा! गजब  तमाशा।
दौड़ रही रस्सी के पुल पर, एक असीमित आशा।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, जग इससे अनजाना।
आज यहाँ, कल कहाँ मिलेगा, इनको ठौर ठिकाना।

छन्न पकैया, छन्न पकैया, स्वाँग धरे ये जोकर।

जन-जन को तो हँसा रहे हैं, अपने मन में रोकर। 

-कल्पना रामानी  

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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