अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

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Saturday, 22 August 2015

दीनों की दुनिया अलग

दीनों की दुनिया अलग, होती सबसे खास।   
आशाओं की पोटली, रहती इनके पास।

चाहे खरपतवार हो, या बिखरे हों शूल।
हर विपदा के बाग में, खिलते ये बनफूल।

बाधाओं की बाढ़ में, जीवन हो दुश्वार।  
थामे रहते किन्तु ये, हिम्मत की पतवार।

छूटे चाहे आशियाँ, या रूठे तकदीर।
मगर नहीं है टूटता, इनके मन का धीर।

शीत, ताप, हिमपात को, सहज मानते मीत।
बारिश भी इनके लिए, कब लिखती नवगीत।

हाकिम इनके हाल पर, करते केवल शोर।
इनकी काली रात की, कभी न होती भोर।

यही प्रार्थना, 'कल्पना', इनको मिले प्रकाश।
विषम भूमि इस देश की, सम हो पाती काश!

-कल्पना रामानी 

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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