अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

Monday, 10 June 2013

हुई विदाई ग्रीष्म की

हुई विदाई ग्रीष्म की, आया वर्षा काल।
सोंधी मोहक गंध से, तन मन हुआ निहाल। 

मुक्त हुए तन स्वेद से, शीतल चली बयार।
मन मयूर गाने लगे, झूम मेघ मल्हार।

कहीं चमकती बिजलियाँ, कहीं घटा घनघोर।
मन को पुलकित कर रहा, बादल का यह शोर।

सूरज कब आया,गया, दिन बीता कब शाम। 
बरखा के सत्कार में, भूले प्रश्न तमाम।

भीगी भीगी शाम से, हर्षित तन,मन,रोम।
इन्द्र धनुष सहसा दिखा, सजा रंग से व्योम।

बूँदें टप टप गा उठीं, बारिश में भरपूर।
खिले फूल कलियाँ हँसीं, नाचे मगन मयूर।

मिट्टी की खुशबू उडी, घुले स्नेह के रंग।
पहली बारिश आ गई, चाय पकौड़ी संग।  


-कल्पना रामानी 

3 comments:

मीनाक्षी said...

सभी दोहे वर्षा का सजीव चित्रण करते हुए मन मोहते हैं।

शरद तैलंग said...

लाजवाब !

sandip srijan said...

सुन्दर सामयिक सृजन ....

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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