अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

Thursday, 7 February 2013

बसंती दोहे














ऋतु बसंत की गई, उत्सव का है दौर। 
कोयल सुर में गा उठी, लदे आम पर बौर।  

गुलमोहर कचनार भी, खिले खिले हैं आज। 
पुष्प पल्लवों से सजा,ऋतु बसंत का ताज।
  
जंगल में मेला लगा, पशु पक्षी  थे साथ। 
चर्चाओं में खास थी, ऋतु रानी की बात।

कमी हो जब अन्न की, जल के स्रोत अनंत।
महके हरित वसुंधरा, होगा सदा बसंत।

सरसों फूली खेत में, स्वर्णलता सी धूप। 
देखा यहाँ बसंत का, अद्भुत मोहक रूप।

कलियाँ दावत दे रहीं, मधुर मधुर मकरंद। 
गीत सुनातीं तितलियाँ, भँवरे लिखते छंद।

कंत! पूछती कामिनी, मुझसे सुंदर कौन?
कलियों पर नज़रें टिकीं, प्रश्न हो गया मौन।

-कल्पना रामानी

No comments:

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

Google+ Followers

Followers