अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

Wednesday, 24 September 2014

मान बढ़ाओ देश का कर नारी का मान /दोहा मुक्तक


मेला है नवरात्रि का, फैला परम प्रकाश।
देवी की जयकार से, गूँज उठा आकाश।
माँ प्रतिमा सँग घट सजे, चला जागरण दौर। 
आलोकित जीवन हुआ, कटा तमस का पाश।
 
गरबा उत्सव की मची, चारों ओर धमाल। 
आस्तिकता, विश्वास में, भारत देश कमाल।
शक्तिमान, अपराजिता, माँ दुर्गा को पूज। 
अर्पित कर भाव्यांजली, जन-जन हुआ निहाल।
 
आता है जब क्वार का, शुक्ल पक्ष हर बार।   
दुर्गा मातु विराजतीं, घर-घर मय शृंगार।
जुटते पूजा पाठ में, भेद भूल सब लोग। 
बड़े गर्व की बात है, भारत इक परिवार।
 
भक्ति-पूर्ण माहौल का, जब होता निर्माण।
दुष्ट-दुष्टतम मनस भी, बने शुद्धतम प्राण।
जीवन भर हों पाप में, रत चाहे ये लोग। 
पर देवी से माँगते, मृत्यु-बाद निर्वाण।  
 
देवी के आह्वान से, होते सभी प्रसन्न।
रमता मन नवरात में, त्याग, भोग-जल-अन्न।
मेले, गरबे, झाँकियाँ, सजते सारी रात।
इस विधि होता पर्व ये, नौ दिन में सम्पन्न। 
 
दनुज नहीं तुम हो मनुज, मत भूलो इंसान।
मान बढ़ाओ देश का, कर नारी का मान।
देवि-शक्ति माँ रूप है, नारी भव का सार।
नारी से ही बंधुवर, है आबाद जहान।    

-कल्पना रामानी  

No comments:

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

Google+ Followers

Followers