अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

Thursday, 10 July 2014

मंगल-वर्षा ज्यों गिरी


मंगल-वर्षा ज्यों गिरी, मुदित हुआ संसार।
जन-जन मन की तल्खियाँ, बहा ले गई धार।
 
भीगी भीगी शाम से, हर्षित तन,मन,रोम।
इन्द्र धनुष सहसा दिखा, सजा रंग से व्योम।
 
आँख मिचौनी सूर्य की, देख बादलों संग।
खेल रचाकर हो रही, कुदरत खुद ही दंग।
 
बौछारों की बाढ़ से, जल-थल हुए समान।
जल स्रोतों ने पग बढ़ा, छुए नए सोपान।
 
शिखरों को छूने बढ़े, बादल बाँह पसार।
स्वागत करने वादियाँ, कर आईं शृंगार।
 
छेड़ी ऋतु ने रागिनी, उमड़े भाव अपार।
कलम-कलम देने लगी, गीतों को आकार।
 
सुन सुखदाई सावनी, जल-बूँदों का शोर।
लतिकाएँ बन बाँवली, चलीं बुर्ज की ओर। 
  
अमृत वर्षा से मिली, जड़ चेतन को जान।
अंकुर फूटे भूमि से, खिले खेत, उद्यान।
 
चाह यही, न कहीं रहें, सूखे के अवशेष।
उर्वर सालों साल हो, यह माटी, यह देश।   

-कल्पना रामानी

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