अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

Saturday, 7 September 2013

कर में बसते देवता



कर में बसते देवता, कर दर्शन नित प्रात
एक नए संकल्प से दिन की हो शुरुवात।
 
कर दाता, कर दीन भी, जैसा करें प्रयोग।
छिपा हुआ हर हाथ में, सुख दुख का संजोग।
 
दिखलाती हर रेख है, जीवन की तस्वीर।
अपने हाथ सँवार लें, खुद अपनी तकदीर।
 
अपनेपन से है बड़ा, भाव न दूजा कोय।
हाथ मिलें तो गैर भी, पल में अपना होय।
 
गुस्से में जब कर उठे, मन हो जाता खिन्न। 
सहलाए कर प्यार से, तो हो वही प्रसन्न।
 
अंतर में चाहे भरा, कितना भी दुर्भाव।
होता स्नेहिल स्पर्श से, पशु मन में बदलाव।
 
कर से ही निर्माण हैं, कर से ही विध्वंस
या तो मनुज कहाइए, या फिर दनुज नृशंस।


-कल्पना रामानी

पुनः पधारिए


आप अपना अमूल्य समय देकर मेरे ब्लॉग पर आए यह मेरे लिए हर्षकारक है। मेरी रचना पसंद आने पर अगर आप दो शब्द टिप्पणी स्वरूप लिखेंगे तो अपने सद मित्रों को मन से जुड़ा हुआ महसूस करूँगी और आपकी उपस्थिति का आभास हमेशा मुझे ऊर्जावान बनाए रखेगा।

धन्यवाद सहित

--कल्पना रामानी

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