अगर न सुलझें उलझनें/सब ईश्वर पर छोड़। नित्य प्रार्थना कीजिये/ शांत चित्त कर जोड़।

Tuesday, 4 September 2012

खोए खोए लोग















जब से आए शहर में,लेकर धन का रोग
यहाँ अकेले हो गए, खोए खोए लोग।

 ना तो कोई मित्र है, ना ही रिश्तेदार
और मिल पाया यहाँ, अपनों का वो प्यार।

 सुबह निकलते काम पर, दिन भर बने मशीन
रात गए घर लौटते, थके हुए गमगीन।

 सपने तो देखे बड़े, मद में थे तब चूर
रहे हाथ खाली, हुए, स्वजनों से भी दूर।

हालत शहरों की दिखी, गाँवों से बदहाल
घर ऐसे ज्यों घोंसले, सड़कें उलझा जाल।

सब पाने की होड़ में, दौड़े बेबुनियाद
क्या पाया क्या खो दिया, अब रहा वो याद।

 हुए अकेले माँ पिता, कौन बंधाए धीर
रेखा चित्र दिखा रहे, इन चेहरों की पीर।

 सुविधाओं को गाँव में, ले आते जो आज
क्यों शहरों को दौड़ते, खोकर अपना राज।


-कल्पना रामानी

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--कल्पना रामानी

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